अकबर को अकबर महान क्यों कहा जाता था ?

अकबर महान का जीवन परीचय:

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अकबर (1542-1605): अकबर महान की गणना ना केवल भारत के, बल्कि विश्व के महान सम्राटों में की जाती है। अकबर के पिता का नाम हुमायूं तथा माता का नाम हमीदा बानो बेगम था।
भारत में हुमायूं के पिता बाबर ने मुगल साम्राज्य की स्थापना कर दी थी, परंतु उस समय मुगल साम्राज्य की नींव मजबूत नहीं थी।
अकबर का पूरा नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर था। अकबर का पिता हुमायूं शेरशाह से हारकर जब फिर से सैन्य शक्ति एकत्रित
करने के लिए इधर उधर भटक रहा था, तभी अमरकोट में राजा वीर साल के यहां अकबर का जन्म हुआ।


13 वर्ष की कम आयु में ही अकबर महान को पंजाब का सूबेदार बना दिया गया, और कुछ समय बाद जब हम आयोग की सीढ़ियों से गिरकर
मृत्यु हुई तो उसे सिंहासन पर बैठा दिया गया। इस समय अकबर का संरक्षक उसका चाचा बैरम खान बना।

अकबर के सामने शुरू में बड़ी कठिनाइयां आई। परंतु बैरम खान ने अपनी वीरता, व्यवहार कुशलता और कूटनीतिक गीता से 4 वर्ष में
ही मुगल साम्राज्य को काफी फैला दिया।


1560 में जब बैरम का हज यात्रा को जा रहा था तब उसकी मृत्यु हो गई और अकबर महान ने पूरे राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
अकबर ने अपनी सेना को सुसज्जित तथा संगठित करके संपूर्ण उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत के बहुत बड़े भाग पर अपना प्रभुत्व
स्थापित कर दिया।

1576 ईस्वी में अकबर महान के साम्राज्य के बराबर दुनिया में कोई और साम्राज्य नहीं था। अकबर ने एक सुगठित शासन
व्यवस्था स्थापित की। उसने राजनीति में उदारता, धार्मिक स्वतंत्रता और न्याय की नीति अपनाई।


अकबर यहां भली भांति जानता था कि हिंदुओं का विश्वास और सहयोग प्राप्त किए बिना राज्य की नींव मजबूत नहीं की जा सकती है।
इसलिए उसने राजपूत राजाओं के साथ मैत्री संबंध के साथ साथ विवाह संबंध भी स्थापित कीये।

अकबर महान ने हिंदू राजा भारमल की पुत्री जोधाबाई से विवाह किया तथा जोधा के भाई राजा मानसिंह को अपने दरबार के नौ रत्नों में
शामिल किया। अकबर ने हिंदुओं पर लगने वाले जजिया कर और तीर्थ कर को समाप्त कीमा, और अपने राज्य में गाय की हत्या पर
प्रतिबंध लगा दिया गया।


अकबर महान ने अपनी सेना और दरबार में हिंदू राजा और राजपूत राजाओं को बड़े बड़े पद पर नियुक्त किया जिससे उसका राज्य और
मजबूत होता चला गया। सभी राजपूत राजाओ ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी लेकिन एक राजा ऐसा था जिसने अकबर
की अधीनता आजीवन स्वीकार नहीं की और मरते दम तक उसके विरुद्ध संघर्ष करते रहे उस राजा का नाम महाराणा प्रताप था।


अकबर महान द्वारा प्रजा की भलाई के लिए किए गए कार्य:


अकबर ने पहले ही जजिया कर और तीर्थंकर समाप्त कर प्रजा के लिए भलाई का काम किया था। तथा साथ ही उसने अपनी प्रजा की
भलाई के लिए कई प्रशासकीय सुधार कीये। जमीन को ठीक ढंग से मापने के लिए उसने लंबाई और क्षेत्रफल की इकाइयों गज और
बीघा के ठीक मान निश्चित कीए गए। टोडरमल ने इस कार्य में अकबर की सहायता की।


अकबर ने कई ऐसे सामाजिक सुधार भी किए जिनका उसकी प्रजा के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। 1582 ईस्वी में उसने एक घोषणा
जारी कर गुलामी बंद करवा दी और यहां आदेश दे दिया कि युद्ध के कैदी गुलाम ना बनाए जाए।

1592 में उसने एक और आदेश निकाला कि कोई भी विधवा स्त्री अपनी इच्छा के विरुद्ध सती ना कराई तथा 16 वर्ष से पहले किसी
लड़के का तथा 14 वर्ष से पहले किसी लड़की का विवाह ना कराया जाए। उसने शराब की बिक्री और उत्पादन पर भी कई तरह के
प्रतिबंध लगा दिए।


अकबर ने फतेहपुर सीकरी में इबादत खाना बनवाया था जिसमें सभी धर्मों के विद्वान एकत्रित होते थे और पूरी स्वतंत्रता के साथ
अपने धार्मिक विचार व्यक्त किया करते थे। अकबर ने दीन ए इलाही नामक एक नया धर्म चलाने का भी प्रयत्न किया जिसमें सभी
धर्मों की अच्छी-अच्छी बातें सम्मिलित थी। दीन ए इलाही धर्म को अपनाने वाला पहला राजा बीरबल था।

अकबर महान के दरबार के नवरत्न

अकबर यद्यपि पढ़ा लिखा ना था पर वहां बहुत ही बुद्धिमान और साहित्य तथा कला का प्रेमि था। अकबर का दरबार विद्वानों,
साहित्यकारों और कलाकारों से सुशोभित था। अकबर के दरबार में नवरत्न थे जो इस प्रकार है-

  1. अब्दुल रहीम खानखाना
  2. अबुल फजल
  3. फ़ैजी
  4. तानसेन
  5. मानसिंह
  6. टोडरमल
  7. बीरबल
  8. मुल्ला दो प्याजा
  9.  हकीम हुमाम
    अकबर ने संस्कृत ग्रंथों को फारसी और फारसी ग्रंथों को संस्कृत में अनुवाद को प्रोत्साहन दिया। और उसने ऐसी इमारतों का निर्माण
    करवाया जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों की मिश्रित शैली की स्पष्ट छाप है।
    अकबर ने कैसे शासन की स्थापना की जिसमें सभी जातियों और धर्मों के लोगों को उन्नति करने का समान अवसर प्राप्त था। उसके
    विशाल साम्राज्य में सर्वत्र एक ही शासन व्यवस्था थी और एक सी न्याय व्यवस्था भी थी।
    अंततः 1605 में अकबर की मृत्यु हो गई।

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