30 नवंबर गुरु नानक देव जी की जंयती पर जानिए उन्होंने कैसे किया सच्चा सौदा

गुरु नानक देव जी

कार्तिक पूर्णिमा के दिन पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के तलवंडी नामक स्थान पर सन् 1469 में गुरु नानक देव जी का जन्म माता तृप्ता व पिता मेहता कालूचंद खत्री के घर हुआ। गुरु नानक जी की बड़ी बहन का नाम नानकी था। इसलिए इनका नाम नानक रखा। गुरु नानक देव जी की जयंती प्रकाश पर्व के रूप में मनाई जाती  है।

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गुरु नानक देव जी का बचपन-


नानक देव जी का मन बाल अवस्था से स्कूली शिक्षा में नहीं लगता था। वहां साधु संतो की संगत करना पसंद करते थे तथा अपना अधिकतम समय साधु-संतों के बीच बिताते थे।  गुरु नानक देव जी के पिता को उनकी साधु संगत बिल्कुल पसंद नहीं थी क्योंकि वहां भी हर पिता की तरह चाहते थे कि उनका पुत्र भी अन्य बालकों की तरह संसारिक कार्य करें और अपने जीवन में तरक्की करें।

जनेऊ कैसी हो-


ग्यारह वर्ष की उम्र में जब नानक देव जी को जनेऊ धारण करवाया जा रहा था तो उन्होंने पंडित जी से कहा कि मुझे ऐसी जनेऊ पहनाओ “जिसमें दया का कपास, संतोष का सूत , संयम की गांठ हो और जो ईश्वरीय हो। जो न तो टूटता है, न गंदा होता है, न जलता है, न नष्ट होता है।” क्योंकि कोई ऐसी जनेऊ पहन कर ही सधन्य हो सकता है।

सच्चा सौदा :-


एक बार नानक देव जी को उनके पिताजी ने ₹20 देकर व्यापार करने के लिए कहा। गुरु नानक जी ने उन रुपयों से साधु संतों को भोजन करवाया तथा वापस घर लौट आये। जब घर पर पिताजी ने उनसे पूछा कि उन्होंने उन पैसों का क्या किया तब गुरु नानक जी ने जवाब दिया की मैंने सच्चा सौदा किया, उन पैसों से मैंने साधु संतों को भोजन कराया। जिस पर नानक देव जी के पिता ने बहुत नाराजगी व्यक्त की।

वर्ष 1485 में इनका विवाह सुलखनी देवी के साथ हुआ। 28 वर्ष की उम्र में प्रथम पुत्र श्री चंद का जन्म हुआ तथा 31 वर्ष में दूसरे पुत्र लक्ष्मीचंद का जन्म हुआ। नवंबर 1504 को गुरु नानक जी के बहनोई जयराम ने गुरु नानक जी को अपने पास सुल्तानपुर बुला लिया तथा वहा  के गवर्नर दौलत खां के यहां भंडार के देखरेख का कार्य में लगा दिया।

गुरु नानक देव जी का निस्वार्थ सेवा का भाव-


नानक देव जी अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा गरीबों, साधु-संतों को भोजन करवाने में खर्च कर दिया करते थे।

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गुरु नानक देव जी रोजाना सुबह वैन नदी में स्नान करने के लिए जाते थे। एक दिन उन्होंने स्नान करने के लिए नदी में डुबकी लगाई और बाहर नहीं निकले, जब 3 दिन पश्चात नदी से बाहर निकले तब उन्होंने कहा-एक ओंकार सतनाम। इसके बाद अपने परिवार का भार अपने ससुर मूला को सौंपते हुए साथी मरदाना, रामदास, बाला और भाई लहना, के साथ धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए निकल पड़े, चारों ओर घूमकर उपदेश देने लगे।

जब गुरु नानक देव जी ने मर्दाना को अच्छाई के विस्तार व बुराई को संकुचित रखने का पाठ पढ़ाया-


नानक देव जी अपनी यात्रा के दौरान एक गांव में पहुंचे  और वहां पर रात्रि विश्राम के लिए रुके। उस गांव के लोग बड़े ही दुष्ट थे उन लोगों ने गुरु नानक जी व उनके साथियों के साथ बड़ा गंदा व्यवहार किया उनसे अभद्र शब्दों में बात की, यहां तक की उन पर पत्थर भी फेंके। अगले रोज सुबह जब गुरु नानक जी वहां से जाने लगे तो उन्होंने उन लोगों को कहा तुम हमेशा यही बसे रहो और प्रस्थान कर गए।


अगली रात्रि वहां जिस गांव में विश्राम के लिए रुके वहां के लोगों ने उनका सादर सेवा सत्कार किया। सम्मान के साथ गुरु जी को सुना और उनकी सेवा की अगले रोज सुबह गुरु नानक देव जी ने विदाई लेते हुए गांव वालों से कहा की ईश्वर करे तुम सब उजड़ जाओ। गुरु नानक जी की यह सब बातें  मर्दाना को समझ नहीं आ रही थी|

उन्होंने सहज भाव से गुरु नानक जी से पूछा कि आपने बुरे लोगों को एक जगह बसने के लिए कहा और जो अच्छे लोग है उनको उजड़ जाने को कहा गुरुजी ने मर्दाना को बताया कि बुरे लोग जहां जाते है बुराई फैलाते है इसलिए उनका एक जगह बसे रहना जरूरी है, इसके विपरीत अच्छे लोग जहां जायेंगे वहां अच्छाई की खुशबू  फैलाएंगे।

नानक देव जी अंधविश्वास, आडंबर, पाखंड, का विरोध करते थे। इन्होंने मूर्ति पूजा को अनावश्यक बताते हुए एक परमात्मा की उपासना का अलग मार्ग पूरी मानव जाति को दिया। सन् 1521 तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूर्ण किए जिन्हें उदासियां कहा जाता है, इस यात्रा के दौरान इन्होंने अफ़गानिस्तान, फारस, अरब, और भारत का भ्रमण किया।

जब गुरु नानक देव जी ने नवाब को नमाज में सही हाजिरी  सिखलाई-


जब यात्रा के दौरान एक स्थान पर नानक देव जी ने हिंदू-मुस्लिम के बीच आपसी मतभेद को मिटाते हुए दोनों को ही उस परमपिता परमात्मा की संतान बताया तो वह के नवाब ने नानक देव जी को अपने साथ मस्जिद चलकर नमाज पढ़ने के लिए कहां! गुरु नानक देव जी राजी होकर नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद में खड़े हो गए।

जब नमाज पूरी होने पर नवाब ने गुरु नानक जी से नमाज न पढ़ने का कारण पूछा तब गुरु नानक जी ने सहज भाव से नवाब की ओर देखा और कहां मैं किसके साथ नमाज पढ़ता आप तो कंधार में घोड़े खरीद रहे थे और आपके काजी उस बछेड़ा की देखभाल कर रहे थे जो कि उनकी घोड़ी ने आज ही दिया है।

नानक देव जी सन् 1521 से 1539 तक करतारपुर में आकर बस गए तथा यहां पर एक बड़ी धर्मशाला बनवाई तथा अपने परिवार के साथ रहते हुए मानव सेवा में अपना समय लगा दिया। 22 सितंबर 1539 को गुरु नानक देव परम ज्योति में विलीन हो गए।

उत्तराधिकारी-

मृत्यु से पूर्व गुरु नानक देव जी ने अपना उत्तराधिकारी अपने शिष्य भाई लहना को घोषित किया जो कि बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।

वैसे तो गुरु नानक जी के जीवन और उनकी महिमा का लेखन बहुत से महापुरुषों ने किया है। हिंदी धाम परिवार ने भी एक छोटी सी कोशिश गुरु नानक जी के जीवन पर लेख लेखन कि की है। यदि हम इस महान आत्मा के सागर रुपी जीवन की एक बूंद का भी वर्णन करने में सफल होते हैं तो यह हमारा प्रयास सिद्ध होगा

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