बाबा गरीबनाथ:बाबा गरीबनाथ जी की जीवन कथा

इस साल 2 अप्रैल को मनेगा शाजापुर जिले के अवन्तिपुर बड़ोदिया में बाबा गरीबनाथ समाधि उत्सव

  उतारा जाएगा 85 फुट ऊँचा स्मृति ध्वज

 कोविड के चलते बाबा गरीबनाथ के मेंले केआयोजन पर प्रतिबंध

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अवन्तिपुर बड़ोदिया

      जन जन की आस्था के केंद्र संत श्री गरीब नाथ के 750 वर्ष प्राचीन समाधि स्थल पर प्रतिवर्षानुसार आयोजित होने वाले समाधि उत्सव को परम्परानुसार विधिवत रूप से मनाया जायेगा.. किन्तु कोरोना के बढ़ते हुए संक्रमण को दृष्टिगत रखते हुए मेले के आयोजन पर शासन स्तर पर प्रतिबंध रहेगा.. 

 क्या है मान्यता

बाबा गरीबनाथ का जन्म कब और कहाँ हुआ था ये तो अज्ञात है.. किन्तु प्राचीन दुर्लभ लेखों के अनुसार बाबा गरीबनाथ जाती से गोसाईं थे.. संवत 1246 में झाँसी के जूना मठ से अपने गुरु हरगिरीदास जी महाराज के समाधि लेने के पश्चात तीर्थयात्रा पर निकले और अवन्तिपुर बड़ोदिया आ पहुंचे.. और नेवज नदी के सुरम्य तट पर कुटिया बनाकर माँ जगदम्बा की सेवा करते हुए अपनी तपस्या से अनेक चमत्कार दिखाने लगे.. ग्रामीण जन भी वशीभूत होकर बाबा का  की सेवा में लगे रहते थे।

रंगपंचमी के दिन बाबा ने अचानक समाधि लेने की इच्छा जताई.. और एक उत्सव के रूप में बाबा का समाधि संस्कार हुआ.. समाधि लेने के कुछ माह बाद गाँववासी जब तीर्थ यात्रा पर उत्तर प्रदेश के सोरों जी गंगा घाट पर पहुंचे तो बाबा ने सभी को साक्षात दर्शन दिए.. सभी के निवेदन पर बाबा को पुनः बड़ोदिया चलने का आग्रह कर डोली में बैठाकर लाने का प्रयास किया गया तो बाबा अंतर्ध्यान हो गए और एक पत्र छोड़ गये.. जिसमे पुनः बड़ोदिया ना जाने की असमर्थता जताकर रंगपंचमी पर उनकी समाधि उत्सव का विवरण था।

बाबा ने वचन दिया कि आपकी श्रद्धा व आस्था के बल पर मैं सदैव वहाँ विधमान रहकर दीन दुखियों के कष्ट हरता रहूँगा… और हर रंगपंचमी पर किसी ना किसी रूप में जरूर आऊँगा.. आज भी बाबा के काले भँवरे के रूप में आने के हजारों भक्त दर्शन करते हैं।

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   उत्सव विधी

     रंगपंचमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में प्रातः 4 बजे से समाधि स्थल पर मालवीय समाज द्वारा हाथों से खुदाई प्रारंभ होती है.. सुबह 9 बजे सागौन की लकड़ी से निर्मित 85 फुट ऊँचे स्मृति ध्वज को मोटे रस्सों के सहारे उतारने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है.. 10 बजे ध्वज की आवश्यक मरम्मत , रँगाई पुताई, स्नान एवं श्रंगार कर विद्वान ब्राह्मणों द्वारा हवन, पुजन ,आरती के पश्चात विधिविधान के साथ शाम 5 बजे चढ़ाया जाता है।

इस बीच दूर दराज से आये श्रद्धालुओं द्वारा समाधि के 20 फीट गहरे गड्ढे में नारियल, नमक पान आदि सामग्री डालने का क्रम दिनभर चलता रहता है.. हजारों की संख्या डाली गई उक्त पूजा सामग्री से गड्ढा लबालब भर जाता है.. जो अगले साल खुदाई के दौरान यथावत निकलती है जो किसी चमत्कार से कम नहीं..।

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 धार्मिक एवं ऐतिहासिक मान्यता होकर भी स्थान का विकास नहीं 

    बाबा गरीबनाथ के दरबार में विगत वर्षों में कई बार मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री ,सांसदों का आना जाना हुआ और हर बार स्थान को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने की मांग की गई..हर बार आश्वासन भी मिला और घोषणाएं भी हुई..विकास की कार्ययोजना भी बनी और प्रस्ताव भी गए… किन्तु कोई नतीजा नहीं निकला , और उक्त धार्मिक स्थल एवं पहुंच मार्ग आज भी बदहाल है। जबकि बाबा गरीबनाथ का उक्त स्मृति ध्वज सुंदर आकर्षक होने के साथ लम्बाई चौड़ाई में विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्तम्भ (ध्वज) है।

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यहांं भी देंखे:-https://hindidhaam.com/famous-temple-in-madhya-pradesh/

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